कलेक्टर साहिबा-2

< धैर्य और साहस की एक मिसाल >

लेखिका : अंजल राजवीर

My dear beloved readers,

This story is the continued part of our previous story कलेक्टर साहिबा-1. We know you enjoyed our first story a lot. We hope you will enjoy this story as well. Read below to know the story of our courageous and enduring Collector Radha. Thanks

अध्याय 1

हाय राम !!…ये लड़का तो है ही अपने मन का इसने मेरी भोली भाली बहु को भी अपने गंदे सोच में ढाल दिया। आग लगे तेरी नए ज़माने की सोच को। मेरी हाय लगेगी तुझे राममोहन ! ( जी हाँ ये हैं राममोहन की बुआ जी जो अपनी 27 साल की विधवा बहू को दुबारा शादी करने से रोक रहीं हैं क्यूंकि उनका पोता जो 6 साल का है वह कही अपनी माँ के नए घर जाने से उनसे दूर न हो जाये )
बुआ जी की बातों और तानों का राममोहन पे कोई असर नहीं होता क्यूंकि वह उसके नाम के जैसा पुराना नहीं है। वह नए ज़माने का नयी सोच वाला लड़का है और उसे अपनी फुफेरी भाभी का पुनर्विवाह करवाना बहुत ही जरुरी लग रहा है। उसका मानना है की भाभी मात्र 23 बरस की उम्र से अपनी जिंदगी को वही रोके खड़ी हैं। उन्हें अपना घर बसाने का पूरा पूरा अधिकार है।

राममोहन बिना किसी के डर के फिर बोलता है, क्यूँ झूठे आँसू बहा रही हो बुआ। तुमने कभी भाभी को बेटी माना होता तो आज तुम ऐसा नहीं करती। सोचो कि अगर तुम्हारी बेटी 23 बरस कि उम्र में विधवा हो जाती तो क्या तुम जीवन भर उसे अपने पास रखती कि उसकी शादी करवाती तुम। अरे बेटी नहीं तो कम से कम एक औरत मान कर ही सोचो तुम्हारे और फूफा जी के जाने के बाद इनका क्या होगा, किसके भरोसे रहेंगी ये। वैसे भी दुनिया इतनी अच्छी नहीं कि एक अकेली माँ को अच्छे नजरों से देखे और चैन से रहने दे, और सच तो ये है की भाभी को तुमने कभी पूछा ही नहीं कि उनका मन क्या कहता है। वहीं खड़ी उसकी भाभी बस निःशब्द सबकी बातें सुन रही थी। उन्हें तो खुद भी अपनी बेटे को एक पिता का प्यार ना मिल पाने का दुःख था। कभी कभी ज़िन्दगी उन्हें भी वीरान सी लगती, पर वह समाज और अपनी सास के तानों के आगे कुछ सोच ही नहीं पाती।
बुआ फिर रोती चिल्लाती है, तू चुप हो जा राममोहन, कलेक्टर बन कर अपनी कलेक्टर गिरी मेरे ऊपर मत झाड़। तू होगा नए ज़माने का, मुझे अपनी बहू की शादी नहीं करवानी। राममोहन को बहुत गुस्सा आता है और वह गुस्से में बोल जाता है, जब तेरी बेटी बिधवा होगी बुआ, तू तब समझेगी, और चला जाता है। राममोहन की बातें बुआ जी को अंदर से झकझोर देती हैं। उन्हें डर सताने लगता है कि कहीं मेरी बेटी पर मेरे बहू से बुरे बर्ताव करने का हाय न लग जाए। और वह ऊपर मन से ही सही अपनी बिधवा बहू कि शादी के लिए राज़ी हो जाती हैं।
इस प्रकार राममोहन के नए सोच को राह मिल जाती है और वह समाज को सुधरने की अपने पहले कोशिश में सफल हो जाता है।

अध्याय 2
अब बात करे राममोहन की तो राममोहन नए सोच के साथ साथ एक नेक दिल का लड़का है जो दो साल पहले ही कलेक्टर बना है। राममोहन अपने कॉलेज में एक लड़की को बहुत चाहता था और उससे शादी के लिए बात करना चाहता था। पर उसके मन की बात बताने से पहले ही लड़की अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ कर कहीं और चली जाती है। वह उसे बहुत ढूंढता है पर वह नहीं मिलती, राममोहन के दिल को आज भी उसकी तलाश है।
अब हम बात करते हैं, हमारी नयी कलेक्टर साहिबा, राधा की।
राधा आज अपने नए कलेक्टर पद का कार्यभार सँभालने जा रही है। उसके नए जीवन का पहला दिन है। राधा अपने कार्यालय पहुँचती है, वहां लोगों के भीड़ और उनकी ओर से दिए जा रहे फूलों के गुलदस्तों से उसका मन बहुत ही प्रसन्न हो रहा है। वह बड़े ही निष्ठा और साहस के साथ अपना कार्यभार सँभालने के लिए आगे बढ़ रही होती है, स्वागत के कार्यक्रम के उपरांत जब राधा अपने दफ्तर के कुर्सी पे बैठी फाइलों को पढ़ रही होती है, तब उसे एक जानी पहचानी आवाज सुनाई देती है। क्या मैं अंदर आ सकता हूँ? राधा जवाब देती है, जी आइये। अभी तक राधा ने उस इंसान का चेहरा नहीं देखा था, जो उसके सामने खड़ा था। पर जैसे ही उसकी नजर उस पर पड़ती है, राधा और वह इंसान दोनों एक दूसरे को देख कर स्तब्ध रह जाते हैं। राधा तुम ! राधा भी आश्चर्य के साथ बोलती है , राममोहन तुम ! यहाँ कैसे? (राधा वही लड़की है जिसे राममोहन बरसों से खोज रहा था, उसका पहला प्यार जो अब तक अधूरा था, राधा। )
इस प्रकार आज राममोहन को वह लड़की मिल गयी, जिसे वह बरसों से ढूँढ रहा था। राममोहन, राधा को उसका सपना जो की कलेक्टर बनने का था, उसके पूरे होने की बधाई देता है और बोलता है, तुम तो अचानक ही गायब हो गयी राधा, कम से कम किसी को तो बताती, कहाँ चली गयी थी तुम? कहाँ थी इतने सालों से ? राधा कुछ नहीं बोलती और राममोहन फिर बोलता है, और अंकल आंटी कैसे हैं और कहाँ हैं वो? राधा जवाब देती है, वो लोग अच्छे हैं, और यहीं हैं मेरे साथ। राममोहन ख़ुशी जताते हुए बोलता है, मिलवाओ कभी उनसे। आंटी के हाथ की बनी खीर स्वादिष्ट हुआ करती थी, जो तुम सबको अपने जन्मदिन पर खिलाया करती थी। राधा कहती है जरूर, तुम आज ही चलो तो मिलवा दूँ। राममोहन बहुत खुश होता है। राधा ने तो उसके मन की बात को बिना जाने ही पूरा कर दिया । (वास्तव में राममोहन अपने अधूरे प्यार को पूरा करना चाहता था। इसके लिए वो राधा के माता पिता से मिलना चाहता था। उसे ये बात अच्छी तरह मालूम थी अगर वो राधा से इस बारे में बोलेगा तो वह नहीं मानेगी। अपने पापा की लाडली बेटी है वो, उसके लिए उसके पिता से बढ़कर कोई नहीं हो सकता। )
राधा और राममोहन दफतर के बाद राधा के घर की ओर निकल जाते हैं। राधा की माँ उसके इंतज़ार में कबसे बैठी थी। आखिर आज राधा के ज़िन्दगी का नया पड़ाव जो शुरू हो रहा था। दरवाजे पर गाडी रूकती है और राधा राममोहन के साथ घर के अंदर जाती है। राधा बिटिया कैसा रहा तुम्हारा आज पहला दिन ? सब ठीक तो रहा ना ? और ये कौन है ? राममोहन की तरफ इशारा करते हुए राधा की माँ ने राधा से पूछा। राधा, राममोहन के बारे में बताती है, माँ ये राममोहन है, मेरे कॉलेज में मेरे साथ पढता था और मेरा बहुत अच्छा दोस्त था। इसने मेरी पढ़ाई में बहुत मदद की थी। राधा की माँ बोलती है, ओ ! तुमने कुछ बताया नहीं इसके बारे में, राधा कुछ नहीं बोलती। किचन में राधा की माँ चाय बनाते हुए सोचती है, राधा ने बताया क्यों नहीं कभी की इसका राममोहन नाम का दोस्त भी था। राधा, राममोहन को अपने पिताजी से मिलवाती है। उसके पिताजी व्हील चेयर पर बैठे होते हैं, ये देख कर मोहन चौंक जाता है। ये कब हुआ। अंकल तो काफी स्वस्थ थे, कॉलेज में देखा था मैंने इन्हे।
राधा के पिता दुखी मन से बताते हैं कब हुआ ये। राधा की माँ चाय ले कर आती है। सब बातें करते हैं।
बच्चे (आरोही और रोहन) अपने टूशन क्लासेज से घर आ जाते हैं। नानी नानी, हम आ गए, कुछ खाने को दो, बहुत भूख लगी है। राधा की माँ बच्चों के लिए पोहा ले आती हैं और वे खाते खाते पूछते हैं, मम्मा कैसा था आपका आज का दिन। हमने आपको बहुत मिस किया। राममोहन सोच में पड़ जाता है। ये बच्चे राधा को माँ बोल रहे है, राधा की शादी कब हुई ? और इतने बड़े बच्चे ? कॉलेज में तो वह कुँवारी ही थी। क्या हो रहा है ये ? और वह तुरंत पूछता है, आंटी राधा के इतने बच्चे इतने बड़े ? राधा की माँ राममोहन को कुछ बताना नहीं चाहती और बोलती हैं, बेटा ये राधा के बड़े बहन के बच्चे हैं, और इसके माता पिता के गुज़र जाने के बाद राधा ही इनकी माँ और पिता है। ये देख कर राधा को अपने माँ के ऊपर गुस्सा आता है, और सोचती है माँ क्यों छुपा रही है मेरा अतीत। आज मैं जो कुछ हूँ वो अपने बच्चों के कारण ही हूँ और ये मेरे ही बच्चे हैं। पर राधा उस वक़्त कुछ नहीं बोलती।


(प्रिय पाठक, राधा का अतीत जानने के लिए आप कलेक्टर साहिबा कहानी का भाग 1 पढ़ें, इतनी सी उम्र में राधा 7-8 साल के बच्चों की माँ कैसे बनी और उसने कलेक्टर बनने का सफर कैसे तय किया और इस सफर में उसका किसने साथ दिया ? ये सब की जानकारी आपको भाग 1 में मिलेगी। )

अध्याय 3
राममोहन रात के खाने के बाद ही राधा के घर से जाता है, और इतने देर में उसके दिमाग में तीन बातें चलती रहती हैं, 4 साल पहले राधा की शादी हुई थी तो 8 साल का रोहन और आरोही इसके बच्चे कैसे हो सकते हैं ? और राधा के माता पिता के अलावा एक औरत थी उस घर में
जो राधा के माँ से बड़ी लग रही थी, वो कौन थी ? और वो अपने माता पिता की इकलौती संतान थी, तो राधा की माँ ने ये क्यूँ कहा की राधा की बड़ी बहन भी थी। वह रात को ठीक से सो नहीं पाता है ये सब सोचते सोचते।
राधा भी राममोहन के मिलने से अपने कॉलेज की ज़िन्दगी को याद करने लगती है। कितना ख्याल रखता था राममोहन उसका।
सुबह होती है, राधा बच्चों को स्कूल छोड़कर अपने दफ्तर चली जाती है। दफ्तर का कार्यभार सँभालते ही वो अपने क्षेत्र के तरक्की के बारे में सोचने लग जाती है।
राममोहन अकसर राधा के घर उससे मिलने रविवार पहुँच जाया करता। कभी कभी दोनों में फ़ोन पर भी बातें होती। अब तक वह जान गया था की राधा उन बच्चों की माँ कैसे बनी। उसे भी राधा की पिछली ज़िन्दगी को लेकर संवेदना थी। वह मन ही मन राधा को चाहता रहा। वहां राधा इन सब चीजों से अनजान, नए नए योजनाएँ बनाती है अपने क्षेत्र के विकास के लिए।
राधा बहुत कोशिशों के बाद बच्चों के लिए एक आश्रम बनाने में सफल हो जाती है, जहाँ बिना माता पिता के बच्चों को अच्छी परवरिश और अच्छी शिक्षा मिले। इस आश्रम के जरिये वो उन बच्चों की ज़िन्दगी को एक सँवरा हुआ और सुनहरा भविष्य देना चाहती है जिन बच्चों के माता पिता नहीं होते। इस काम में राममोहन उसका पूरा साथ देता है। राधा अपने बच्चों और माता पिता के साथ साथ महेश की माँ का भी पूरा ख्याल रखती है। (राधा के साथ रह रही उसके माँ के उम्र की एक और औरत महेश की माँ यानी राधा की सासू माँ थी। राधा जैसी बहू पा कर वो भी बहुत खुश होती हैं। वो हमेशा सोचती हैं कि काश उनके बेटी जैसी बहू के जीवन में फिर से कोई आ जाये जो उसे ढ़ेर सारा प्यार और खुशियां दे। राधा उनके लिए उनकी बेटी से भी ज्यादा प्यारी थी।
राधा कि माँ और उसकी सासू माँ आपस में अक्सर बातें करती, इतनी कम उम्र में बहुत कुछ सहा है हमारी बच्ची ने, काश हम अपनी बच्ची के लिए कुछ कर पाते। वो हमेशा ईश्वर से प्रार्थना करती कि उनकी बच्ची कि रक्षा करे हमेशा और उसका जीवन खुशियों से भर दें।

अध्याय 4
धीरे धीरे समय बीतता है, राधा और मोहन अब अच्छे दोस्त बन जाते हैं पहले कि तरह। राधा के सामने जब भी कोई समयस्या आती तो वह मोहन से सलाह लिया करती, मोहन भी जब किसी परेशानी में होता तो हमेशा राधा को याद करता और उसपे राधा के विचार और सलाह लेता।
राधा के मन में जबसे कलेक्टर बनने का सपना जगा तब से उसके दिल में इसके साथ कई अरमान भी जगे थे। जैसे बेसहारा बच्चों के लिए सहारा और शिक्षा का इंतज़ाम करना, ‌वृद्धों के लिए नए नए योजनाएं लाना, जिससे उन्हें किसी तरह के सहायता कि जरुरत न हो, ना पैसों कि चिंता हो और ना बेटे बहुओं पे निर्भर रहने की। उनका जीवन सुखमय व्यतीत हो इसका पूर्ण इंतज़ाम करना चाहती थी। इसके साथ ही वो बाल विवाह जैसे गैर कानूनी रीती रिवाजों को भी रोकना चाहती थी जिसके लिए कानून होते हुए भी सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है। जो आज भी कानून के नाक निचे धड़ल्ले से होती है और कानून को खबर तक नहीं होती। इसका सबसे बड़ा और मुख्य कारण है की समाज के ठेकेदार आज भी इस चीज को गलत नहीं मानते और बाल विवाह से उत्पन्न होने वाले नुक्सान को नजरअंदाज करते हैं। जिस उम्र में एक लड़की को स्कूल कॉलेज की शिक्षा मिलनी चाहिए, उसका ध्यान ज्ञान प्राप्त करने और अपना करियर बनाने में होना चाहिए, उस उम्र में वो एक पत्नी और बहू होने की जिम्मेदारियां उठा रही होती है। समय पूर्व माँ बनने से उसका और उसके बच्चे का जीवन कितनी बड़ी संकट में पड़ जाता है, ये बात इन समाज के ठेकेदारों के समझ में नहीं आता। राधा इस तरह के कुरीतियों को बहुत हद तक सफलता पूर्वक रोक पा रही थी, पर इसके साथ ही वो वैसे लोगों की दुश्मन भी बनते जा रही थी जो इन कुरीतियों को आज भी अनुसरित करते हैं, और परंपरा और सामाजिक संरचना के नाम पे ढोते जा रहे हैं।
लोग राधा के द्वारा किये गए कामों और समाज में लाये बदलावों की खूब सराहना करते। उसके तरक्की के चर्चे हर जगह होती। खबरों में भी राधा की काम करने के अनोखे तरीके की खूब तारीफें होती, इतनी कम उम्र में इतना ऊँचा मुकाम और तरक्की हासिल करना और साथ ही विनयशील बने रहना, इस बात की चर्चा और इस पे लेख हर अखबार में छपने लगा। ये सब देख के राधा के पिता का सिर गर्व से ऊँचा हो उठा, और अब वो हर माता पिता को यही सलाह देते की अपनी बेटियों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दें। राधा दिन-प्रतिदिन नए नए योजनाएं ला रही थी और उन्हें सफलता पूर्वक लागू भी कर रही थी। इस तरह काम करते करते कब पूरा एक साल गुज़र गया पता ही न चला।

अध्याय 5
राममोहन बार बार राधा को अपने दिल की बात बताने की कोशिश करता पर राधा तो जैसे अपनी दुनिया में मगन हो गयी थी। राधा जब कभी अकेली होती उसे ये दुःख होता की अगर आज महेश साथ होते तो सब कितना अच्छा होता। बच्चों के पिता के प्यार से वंचित रहने का गम राधा को हर वक़्त कचोटता। कभी कभी उसे अपनी ज़िन्दगी में खालीपन भी लगता, पर वह अपना दुःख दर्द भूल कर समाज में हो रहे भ्रष्टाचार और पाखंडों से लड़ने में लगी रही। वह ये कोशिश हमेशा करती की उसके बच्चों को वह माता और पिता दोनों का प्यार दे। उन्हें अपने पिता की कमी महसूस न हो।
एक रविवार जब राधा अपनी किसी सहेली के यहाँ गयी रहती है, तब उसके घर पे मोहन आता है। राधा को न देख कर वो उदास हो जाता है। ये बात राधा की माँ और उसकी सासू माँ की नजरो से चिप नहीं पाती। वे लोग राममोहन का उदास चेहरा अच्छी तरह भांप जाती हैं। राधा के बिना मोहन का उदास चेहरा वो पढ़ लेती हैं। चाय नास्ता करवा के राधा की माँ राममोहन से पूछती हैं, बेटा आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की ? मोहन कुछ सोच कर राधा की माँ को बोलता है, जी आंटी मैं एक लड़की को बर्षों से चाहता हूँ। पर आज तक कभी बोल नहीं पाया। राधा की माँ को थोड़ा संदेह होता है की वो लड़की कही हमारी बेटी राधा तो नहीं। वो तुरंत पूछ डालती हैं, कहीं वो लड़की राधा तो नहीं ? ये सुन कर मोहन घबरा जाता है और उठ कर जाने लगता है। राधा की माँ उसे रोकती है, बेटा रुको अभी बैठो, घबराओ नहीं, हम तो खुद चाहते हैं की राधा अपना घर बसा ले, अभी उसकी उम्र ही कितनी है। पर राधा नहीं चाहती, उसे डर है कि उसके बच्चों के साथ गलत ना हो जाये और क्या जवाब देगी वो महेश को। उसे उसने वादा किया है कि बच्चों को वो कोई भी कमी महसूस नहीं होने देगी। राममोहन कुछ नहीं बोलता और चला जाता है।
राधा जब घर वापिस आती है तो उसे ये बात पता चलती है कि मोहन आ कर चला गया। वो रात को खाने के बाद मोहन को फ़ोन करती है। मोहन तुम रुके क्यों नहीं ? मोहन ये सुन कर घबरा जाता है, कि आंटी ने कहीं राधा को सारी बातें बता दिया होगा तो राधा दोस्ती न तोड़ दे। और मोहन बोलता है, राधा मैं तुम्हे बहुत दिनों से तुम्हे कुछ बताना चाहा पर हिम्मत नहीं हुई। राधा ये सुन कर चौंक जाती है और मुस्कुराते हुए कहती है, क्या छुपा रहे हो तुम ? ये सुन कर मोहन और भी घबरा जाता है कि अब क्या बोले वो राधा को, फिर कहता है मैं बाद में बात करूँगा। राधा बोलती है ठीक है तुम कल मेरे दफ्तर मुझे लेने आना, फिर घर हम साथ जायेंगे और बातें भी हो जाएँगी।
दोनों कि रात इसी उधेड़-बुन में कटती है। पर मोहन फैसला कर लेता है कि अब वो राधा को सब कुछ बता ही देगा। दूसरे दिन राधा और मोहन मिलते हैं। आज मोहन कि हरकतें राधा को बदली बदली लगती है। वो बोलती है, मोहन दोस्त हूँ मैं तुम्हारी, तुम मुझसे कुछ भी शेयर कर सकते हो। बताओ न प्लीज, क्या हुआ है ? मोहन गाडी में बैठे हुए ही अपनी डायरी राधा को पकड़ा देता है। जिसके कवर पे लिखा था,”मेरा अधूरा प्यार”।

(……..कहानी आगे जारी है। )

Writer: A. Rajveer

Photo by Alejandro Avila on Pexels.com

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