बोल मुसाफिर तू क्या चाहे ?

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पाना चाहे, खोना चाहे
हंसना चाहे, रोना चाहे
जीवन की इस बगिया से तू
कांटे चाहे, कलियाँ चाहे
बोल मुसाफिर तू क्या चाहे ?

इधर ज़िन्दगी, उधर मौत है
सन्नाटे हैं, चचाकचौंध है
अपने आतम से तू मिलकर
जीना चाहे, मरना चाहे
बोल मुसाफिर तू क्या चाहे ?

प्यासी हैं ये आँखें तेरी
प्यासा तेरा अंतर्मन है
अपनी तृष्णा कम करने को
अमृत चाहे, शोणित चाहे
बोल मुसाफिर तू क्या चाहे ?

थमना चाहे,चलना चाहे
बासा छोड़, भटकना चाहे
पल-पल उठती जठरानल से
सारी उम्र तू जलना चाहे
बोल मुसाफिर तू क्या चाहे ?

सपना चाहे, अपना चाहे
नैनों से बरसना चाहे
भूली बिसरी यादों से तू
सारी रात तड़पना चाहे
बोल मुसाफिर तू क्या चाहे ?

कवि: नरेन्द्र कुमार

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