डर लगता है

Photo by Kat Jayne on Pexels.com

चाँद छूने की तमन्ना है, पर रात से डर लगता है।
सितारों से आगे जाना है, पर ऊंचाई से डर लगता है।।

बचपन से यही सिखाया जाता है हमें, की लड़की हैं हम।
लड़कियों को तो ऐसे ही जीना पड़ता है, डर के साथ।।

डर के साथ रहना और डर में जीना।
घर की, समाज की परवाह करना।।
इनकी इज्जत हैं हम यही तो बताया जाता है।
इसीलिए तो डर लगता है।।

उठने बैठने, खाने पीने, सबके के तरीके सिखाये जाते हैं।
उम्र के साथ कौन से कपड़े पहने, ये भी बताये जाते है हमें।।

लड़की के लिए दिन और रात लड़को के लिए,
यही समझाया जाता है।
हर दिन के बाद आने वाली रात से
इसीलिए तो डर लगता है।।

पूरी ज़िन्दगी हमारी काली रात बना के,
बंदिशों में बाँध के, हमारी साँसे तक ले लेते हैं।
और तब अपनी सारी गलती रात के ऊपर,
बस ऐंवी ही कर देते हैं।।

हम तो अँधेरे में चाँद सितारों को देखते हैं।
हम भी चमके यही तो ख़्वाब बुनते हैं।।
पर अचानक से पीछे से कोई, आवाज लगा ही देता है।
लड़की होने का एहसास करा ही देता है।।

लड़की हो कर क्या भला,
कोई ऐसे सपने देख सकता है ?
और फिर करता वो वही सारी बातें।
इसीलिए तो डर लगता है।।

सारी उम्र हमें यही तो बताया जाता है।
लड़की होने का एहसास बार बार कराया जाता है।।
लड़की हैं हम, लड़की हैं हम।
लड़कियों को तो ऐसे ही जीना पड़ता है।।

ये एहसास बार बार कराते हैं।
इसीलिए तो डर लगता है।।
हमें तो रात में चमकते टिमटिमाते,
उन चाँद सितारों को देखने से भी।
डर लगता है।।
लड़की हैं हम, लड़की हैं हम।
इसका एहसास बार बार कराया जाता है।।

Photo by Sam Kolder on Pexels.com

Rating: 5 out of 5.

8 Comments »

  1. Its a nice poem expressing the argony of some of our sisters in this world who have not got their full freedom of expressing their rights

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